पत्थर
मै अकेला, भीड़ में
जिंदगी के मोड़ में, गर्दिशों के शोर में,
भाग्य की इस वंचना को झेलकर भी जी रहा हूँ
पर 'पुरुष' हूँ कौन जाने 'पत्थरों' को
वे नहीं हैं 'टूटते' पर 'दरकते' हैं अचानक
ख्वाहिशों के सोच में या जिंदगी के बोझ में
मैं अकेला, भीड़ में॥
कौन जाने 'मूक' के इस 'मौन' को।
हूँ 'सचेतन', परनजर में एक 'जड़' हूँ
'भावना' भी है मगर वह 'कौन' देखे
देखता है जो तो केवल 'बालुका' का संगठन हूँ
पर अनंतर बालुका के संगठन में रंध्र
के अवकाश में कुछ तो छुपा है
कौन जाने 'मूक' के इस 'मौन' को।
सोचता हूँ छोड़ दूँ इस बंध को मैं भी 'वियोजित'
जो मुझे 'स्थिर' बनाता और 'भंगुर'
देखता हूँ जब मगर मैं 'बालुका' को
जिंदगी की 'अस्मिता' 'स्वाधीनता' को
किंतु झोकों के जरा से 'वातक्रम' में
मैंने देखा बह गया वह 'सहज' होकर
उस दिशा में
मैंने पाया ठीक है वह एक (पत्थर)
जो 'अचल' है 'मुश्किलों' में 'गर्दिशों' में।
- अमर पांडेय

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